.. title: §7ـ हुज़्न-ए इंसान (अफ़्लातूनी इश्क़ पर एक तंज़)
.. slug: itoohavesomedreams/poem_7
.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Ḥuzn-e insān (aflāt̤ūnī ʿishq par ek t̤anz)"
.. type: text



| जिस्म और रूह में आहंग नहीं,
| लज़्ज़त-अंदोज़-ए दिल-आवेज़ी-ए मौहूम है तू
| ख़स्ता-ए कशमकश-ए फ़िक्र‐ओ‐अमल!
| तुझ को है हसरत-ए इज़्हार-ए शबाब
| और इज़्हार से माज़ूर भी है
| जिस्म नेकी के ख़यालात से मफ़रूर भी है
| इस क़दर सादा‐ओ‐मासूम है तू
| फिर भी नेकी ही किये जाती है
| कि दिल‐ओ‐जिस्म के आहंग से महरूम है तू
| 
| जिस्म है रूह की अज़्मत के लिये ज़ीना-ए नूर
| मंबा-ए कैफ़‐ओ‐सुरूर!
| ना-रसा आज भी है शौक़-ए परस्तार-ए जमाल
| और इंसाँ है कि है जादा-कश-ए राह-ए तवील
| (रूह-ए यूनाँ पे सलाम!)
| इक ज़िमिस्ताँ की हसीं रात का हंगाम-ए तपाक
| उस की लज़्ज़ात से आगाह है कौन?
| इश्क़ है तेरे लिये नग़्मा-ए ख़ाम
| कि दिल‐ओ‐जिस्म के आहंग से महरूम है तू!
| 
| जिस्म और रूह के आहंग से महरूम है तू!
| वर्ना शब‐हा-ए- ज़िमिस्ताँ अभी बे-कार नहीं
| और न बे-सूद हैं अय्याम-ए बहार!
| आह इंसाँ कि है वहमों का परिस्तार अभी
| हुस्न बे-चारे को धोका सा दिये जाता है
| ज़ौक़-ए तक़दीस पे मजबूर किये जाता है!
| टूट जाएंगे किसी रोज़ मज़ामीर के तार
| मुस्करा दे कि है ताबिंदा अभी तेरा शबाब
| है यही हज़्रत-ए यज़दाँ के तमस्ख़ुर का जवाब!

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.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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