.. title: §4ـ वादी-ए पिंहाँ
.. slug: itoohavesomedreams/poem_4
.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Vādī-e pinhāñ"
.. type: text



| वक़्त के दरया में उट्ठी थी अभी पहली ही लहर
| चंद इंसानों ने ली इक वादी-ए पिंहाँ की राह
| मिल गई उन को वहाँ
| आग़ोश-ए राहत में पनाह
| कर लिया तामीर इक मौसीक़ी‐ओ‐इशरत का शहर,
| मशरिक़‐ओ‐मग़्रिब के पार
| ज़िंदगी और मौत की फ़रसूदा शह-राहों से दूर
| जिस जगह से आस्माँ का क़ाफ़िला लेता है नूर
| जिस जगह हर सुब्ह को मिलता है ईमा-ए ज़हूर
| और बुने जाते हैं रातों के लिये ख़्वाबों के जाल
| सीखती है जिस जगह पर्दाज़ हूर
| और फ़रिशतों को जहाँ मिलता है आहंग-ए सुरूर
| ग़म नसीब अह्रीमनों को गिर्या‐ओ‐आह‐ओ‐फ़िग़ाँ!
| 
| काश बतला दे कोई
| मुझ को भी इस वादी-ए पिंहाँ की राह
| मुझ को अब तक जुस्तजू है
| ज़िंदगी के ताज़ा जोलांगाह की
| कैसी बेज़ारी सी है
| ज़िंदगी के कुहना आहंग-ए मुसल्सल से मुझे
| सर-ज़मीन-ए ज़ीस्त की अफ़्सुर्दा महफ़िल से मुझे
| देख ले इक बार काश
| उस जहाँ का मंज़िर-ए रंगीं निगाह
| जिस जगह है क़हक़हों का इक दरख़्शंदा वुफ़ूर
| जिस जगह से आस्माँ का क़ाफ़िला लेता है नूर
| जिस की रिफ़्अत देख-कर ख़ुद हिम्मत-ए यज़दाँ है चूर
| जिस जगह है वक़्त इक ताज़ा सुरूर
| ज़िंदगी का पैरहन है तार तार!
| जिस जगह अह्रीमनों का भी नहीं कुछ इख़्तियार
| मशरिक़‐ओ‐मग़्रिब के पार!

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.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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