.. title: §30ـ मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
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.. date: 2016-03-02 15:55:18 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
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.. description: Devanagari version of "Mere bhī haiñ kuchh ḳhvāb"
.. type: text



| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब, मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
|     मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब!
| इस दौर से, इस दौर के सूखे हुए दरयाओं से,
| फैले हुए सहराओं से, और शहरों के वीरानों से
| वीराना-गरों से मैं हज़ीं और उदास!
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब
|     मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब!
| 
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब, मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
|     मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
| वो ख़्वाब कि असरार नहीं जिन के हमें आज भी मालूम
| वो ख़्वाब जो आसूदगी-ए मर्तबा‐ओ‐जाह से,
| आलूदगी-ए गिर्द-ए सर-ए राह से मासूम!
| जो ज़ीस्त की बे-हूदा कशाकश से भी होते नहीं मादूम
|     ख़ुद ज़ीस्त का मफ़हूम!
| 
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब,
| ऐ काहिन-ए दानिशवर‐ओ‐आली-गुहर‐ओ‐पीर
| तू ने ही बताई हमें हर ख़्वाब की ताबीर
| तू ने ही सुझाई ग़म-ए दिलगीर की तसख़ीर
| टूटी तिरे हाथों ही से हर ख़ौफ़ की ज़ंजीर
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब, मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
|     मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब!
| 
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब,
| कुछ ख़्वाब कि मदफ़ून हैं इज्दाद के ख़ुद-साख़्ता अस्मार के नीचे
| उज्ड़े हुए मज़्हब के बना-रेख़्ता औहाम की दीवार के नीचे
| शीराज़ के मजज़ूब-ए तुनक-जाम के अफ़्कार के नीचे
| तहज़ीब-ए निगूंसार के आलाम के अंबार के नीचे!
| 
| कुछ ख़्वाब हैं आज़ाद मगर बड़ते हुए नूर से मरूब
| नै हौस्ला-ए ख़ुब है, नै हिम्मत-ए ना-ख़ुब
| गो ज़ात से बड़-कर नहीं कुछ भी उंहें महबूब
| हैं आप ही उस ज़ात के जारूब
|     —ज़ात से महजूब
| 
| कुछ ख़्वाब हैं जो गिर्दिश-ए आलात से जोयंदा-ए तमकीन
| है जिन के लिये बंदगी-ए क़ाज़ी-ए हाजात से इस दहर की तज़ईन
| कुछ जिस के लिये ग़म की मसावात से इंसान की तमीन
| कुछ ख़्वाब कि जिन का हवस-ए जौर है आईन
|     दुनिया है न दीन!
| 
| कुछ ख़्वाब हैं पर्वर्दा-ए अंवार, मगर उन की सहर गुम
| जिस आग से उठता है मुहब्बत का ख़मीर, उस के शरर गुम
| है कुल की ख़बर उन को मगर जुज़ की ख़बर गुम
| ये ख़्वाब हैं वो जिन के लिये मर्तबा-ए दीदा-ए तर हेच
| दिल हेच है, सर इतने बराबर हैं कि सर हेच
|     —अर्ज़-ए हुनर हेच!
| 
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब
| ये ख़्वाब मिरे ख़्वाब नहीं हैं कि मिरे ख़्वाब हैं कुछ और
| कुछ और मिरे ख़्वाब हैं, कुछ और मिरा दौर
| ख़्वाबों के नए दौर में नै मोर‐ओ‐मलख़ नै असद‐ओ‐सौर
| नै लज़्ज़त-ए तसलीम किसी में न किसी को हवस-ए जौर
|     —सब के नए तौर!
| 
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब,
|     मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब!
| हर ख़्वाब की सौगंद!
| हर चंद कि वो ख़्वाब हैं सर-बस्ता‐ओ‐रू-बंद
| सीने में छुपाए हुए गोयाई-ए दोशीज़ा-ए लब-ख़ंद
| हर ख़्वाब में अज्साम से अफ़्कार का, मफ़हूम से गुफ़तार का पैवंद
| उशशाक़ के लब‐हा-ए- अज़ल-तिश्ना की पैवस्तगी-ए शौक़ के मानिंद
|     (ऐ लम्हा-ए ख़ुर्संद!)
| 
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब, मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
| वो ख़्वाब हैं आज़ादी-ए कामिल के नए ख़्वाब
| हर सी-ए जिगर-दोज़ के हासिल के नए ख़्वाब
| आदम की विलादत के नए जश्न पे लहराते जलाजिल के नए ख़्वाब
| इस ख़ाक की सत्वत की मनाज़िल के नए ख़्वाब
| या सीना-ए गीती में नए दिल के नए ख़्वाब
| ऐ इश्क़-ए अज़ल-गीर‐ओ‐अबद-ताब
|     मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
|     मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब!

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