.. title: §29ـ हसन कूज़ा-गर ४
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.. date: 2016-03-02 15:55:18 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
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.. description: Devanagari version of "Ḥasan kūzah-gar 4"
.. type: text



| जहाँ-ज़ाद, कैसे हज़ारों बरस बाद
| इक शहर-ए मदफ़ून की हर गली में
| मिरे जाम‐ओ‐मीना‐ओ‐गुलदाँ के रेज़े मिले हैं
| कि जैसे वो इस शहर-ए बरबाद का हाफ़िज़ा हों!
| (हसन नाम का इक जवाँ कूज़ा-गर—इक नए शहर में—
| अपने कूज़े बनाता हुआ, इश्क़ करता हुआ
| अपने माज़ी के तारों में हम से पिरोया गया है
| हमीं में (कि जैसे हमीं हों) समोया गया है
| कि हम तुम वो बारिश के क़तरे थे जो रात-भर से,
| (हज़ारों बरस रेंगती रात-भर)
| इक दरीचे के शीशों पे गिरते हुए सांप लहरें
|             बनाते रहे हैं,
| और अब इस जगह वक़्त की सुब्ह होने से पहले
| ये हम और ये नौ-जवाँ कूज़ा-गर
|     एक रोया में फिर से पिरोए गए हैं!)
| 
| जहाँ-ज़ाद—
|     ये कैसा कुहना परस्तों का अंबोह
|         कूज़ों की लाशों में उत्रा है
|                 देखो!
| ये वो लोग हैं जिन की आंखें
|     कभी जाम‐ओ‐मीना की लिम तक न पहुंचें
| यही आज इस रंग‐ओ‐रौग़न की मख़लूक़-ए बे-जाँ
|     को फिर से उलटने पलटने लगे हैं
| ये इन के तले ग़म की चिंगारियाँ पा सकेंगे
|     जो तारीख़ को खा गई थीं?
| वो तूफ़ान, वो आंधियाँ पा सकेंगे
|     जो हर चीख़ को खा गई थीं?
| इंहें क्या ख़बर किस धनक से मिरे रंग आए—
|     (मिरे और इस नौ-जवाँ कूज़ा-गर के?)
| इंहें क्या ख़बर कौन-सी तित्लियों के परों से?
| इंहें क्या ख़बर कौन से हुस्न से?
| कौन सी ज़ात से, किस ख़द््द‐ओ‐ख़ाल से
|     मैं ने कूज़ों के चेहरे उतारे?
| ये सब लोग अपने असीरों में हैं
| ज़माना, जहाँ-ज़ाद, अफ़्सूँ-ज़दह बुर्ज है
| और ये लोग उस के असीरों में हैं—
| जवाँ कूज़ा-गर हंस रहा है!
| ये मासूम वहशी कि अपने ही क़ामत से झ़ूलीदा दामन
| हैं जोया किसी अज़्मत-ए ना-रसा के—
| इंहें क्या ख़बर कैसा आसीब-ए मुब्रम मिरे ग़ार सीने पे था
| जिस ने मुझ से (और इस कूज़ा-गर से) कहा:
| "ऐ हसन कूज़ा-गर, जाग
| दर्द-ए रिसालत का रोज़-ए बशारत तिरे जाम‐ओ‐मीना
|     की तिश्ना-लबी तक पहुंचने लगा है!"
| यही वो निदा, जिस के पीछे हसन नाम का
|     ये जवाँ कूज़ा-गर भी
| पिया पै रवाँ है ज़माँ से ज़माँ तक
|         ख़िज़ाँ से ख़िज़ाँ तक!
| 
| जहाँ-ज़ाद मैं ने—हसन कूज़ा-गर ने—
|     बयाबाँ बयाबाँ ये दर्द-ए रिसालत सहा है
| हज़ारों बरस बाद ये लोग
|     रेज़ों के चुनते हुए
| जान सकते हैं कैसे
|     कि मेरे गिल‐ओ‐ख़ाक के रंग‐ओ‐रौग़न
| तिरे नाज़ुक आज़ा के रंगों से मिल-कर
|         अबद की सदा बन गए थे?
| मैं अपने मसामों से, हर पोर से,
| तेरी बांहों की पहनाइयाँ
|         जज़्ब करता रहा था
| कि हर आने-वाले की आंखों के माबद पे जा-कर चिड़ाऊँ—
| ये रेज़ों की तहज़ीब पा लें तो पा लें
| हसन कूज़ा-गर को कहाँ ला सकेंगे?
| ये उस के पसीने के क़तरे कहाँ गिन सकेंगे?
| ये फ़न की तजल्ली का साया कहाँ पा सकेंगे?
|     जो बड़ता गया है ज़माँ से ज़माँ तक
|             ख़िज़ाँ से ख़िज़ाँ तक
| जो हर नौजवाँ कूज़ा-गर की नई ज़ात में
|         और बड़ता चला जा रहा है!
| वो फ़न की तजल्ली का साया कि जिस की बदौलत
|         हमह इश्क़ हैं हम
| हमह कूज़ा-गर हम
|     हमह-तन ख़बर हम, हमह बे-ख़बर हम
| ख़ुदा की तरह अपने फ़न के ख़ुदा सरबसर हम!
| (आर्ज़ुएँ कभी पा-याब तो सर-याब कभी,
| तैरने लगते हैं बे-होशी की आंखों में कई चेहरे
| जो देखे भी न हों
| कभी देखे हों किसी ने तो सुराग़ उन का
|         कहाँ से पाए?
| किस से ईफ़ा हुए अंदोह के आदाब कभी
| आर्ज़ुएँ कभी पा-याब तो सर-याब कभी!)
| 
| ये कूज़ों के लाशे, जो इन के लिये हैं
|     किसी दास्तान-ए फ़ना के वग़ैरा वग़ैरा—
| हमारी अज़ाँ हैं, हमारी तलब का निशाँ हैं
| ये अपने सुकूत-ए अजल में भी ये कह रहे हैं:
| "वो आंखें हमीं हैं जो अंदर खुली हैं
| तुम्हें देखती हैं, हर इक दर्द को भांपती हैं
|         हर इक हुस्न के राज़ को जानती हैं
| कि हम एक सुंसान हुजरे की उस रात की आर्ज़ू हैं
| जहाँ एक चेहरे, दरख़्तों की शाख़ों के मानिंद
| इक और चेहरा पे झुक-कर, हर इंसाँ के सीने में
|     इक बर्ग-ए गुल रख गया था
| उसी शब का दुज़दीदा बोसा हमीं हैं!"

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