.. title: §28ـ हसन कूज़ा-गर ३
.. slug: itoohavesomedreams/poem_28
.. date: 2016-03-02 15:55:18 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
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.. description: Devanagari version of "Ḥasan kūzah-gar 3"
.. type: text



| जहान-ज़ाद,
|     वो हलब की कारवां-सरा का हौज़, रात वो सुकूत
| जिस में एक दूसरे से हम-किनार तैरते रहे
| मुहीत जिस तरह हो दाइरे के गिर्द हल्क़ा-ज़न
| तमाम रात तैरते रहे थे हम
| हम एक दूसरे के जिस्म‐ओ‐जाँ से लग-के
|         तैरते रहे थे एक शाद-काम ख़ौफ़ से
| कि जैसे पानी आंसुओं में तैरता रहे
| हम एक दूसरे से मुत्मइन ज़वाल-ए उम्र के ख़िलाफ़
|             तैरते रहे
| तू कह उठी: "हसन यहाँ भी खेंच लाई
|             जाँ की तिश्नगी तुझे!"
| (लो अपनी जाँ की तिश्नगी को याद कर रहा था मैं
| कि मेरा हल्क़ आंसुओं की बे-बहा सख़ावतों
|             से शाद-काम हो गया!)
| मगर ये वहम दिल में तैरने लगा कि हो न हो
| मिरा बदन कहीं हलब के हौज़ ही में रह गया—
| नहीं, मुझे दूई का वाहिमा नहीं
| कि अब भी रब्त-ए जिस्म‐ओ‐जाँ का एतबार है मुझे
| यही वो एतबार था
|     कि जिस ने मुझ को आप में समो दिया—
| मैं सब से पहले "आप" हूँ
| अगर हमीं हों—तू हो और मैं हूँ—फिर भी मैं
|         हर एक शै से पहले आप हूँ!
| अगर मैं ज़िंदा हूँ तो कैसे "आप" से दग़ा करूँ?
| कि तेरी जैसी औरतें, जहान-ज़ाद,
|         ऐसी उल्झनें हैं
|     जिन को आज तक कोई नहीं "सुलझ" सका
| जो मैं कहूँ कि मैं "सुलझ" सका तो सर्बसर
|                 फ़रेब अपने आप से!
| कि औरतों की साख़्त है वो तंज़ अपने आप पर
| जवाब जिस का हम नहीं—
| 
| (लबीब कौन है? तमाम रात जिस का ज़िक्र
|             तेरे लब पे था—
| वो कौन तेरे गेसुओं को खेंचता रहा
|                 लबों को नौचता रहा
| जो मैं कभी न कर सका
| नहीं ये सच है—मैं हूँ या लबीब हो
| रक़ीब हो तो किस लिये तिरी ख़ुद-आगही की बे-रिया निशात-ए नाब का
| जो सद नवा‐ओ‐यक नवा ख़िराम-ए सुब्ह की तरह
| लबीब हर नवा-ए साज़-गार की नफ़ी सही!)
| मगर हमारा राब्ता विसाल-ए आब‐ओ‐गिल नहीं, न था कभी
| वुजूद-ए आदमी से आब‐ओ‐गिल सदा बिरूँ रहे
| न हर विसाल-ए आब‐ओ‐गिल से कोई जाम या सबू ही बन सका
| जो इन का एक वाहिमा ही बन सके तो बन सके!
| 
| जहान-ज़ाद,
| एक तू और एक वो और एक मैं
| ये तीन ज़ाविये किसी मुसल्लस-ए क़दीम के
| हमेशा घूमते रहे
|     कि जैसे मेरा चाक घूमता रहा
| मगर न अपने आप का कोई सुराग़ पा सके—
| मुसल्लस-ए क़दीम को मैं तोड़ दूँ, जो तू कहे, मगर नहीं
| जो सिहर मुझ पे चाक का वही है इस मुसल्लस-ए क़दीम का
| निगाहें मेरे चाक की जो मुझ को देखती हैं
|                 घूमते हुए
| सबू‐ओ‐जाम पर तिरा बदन, तिरा ही रंग, तेरी नाज़ुकी
|                     बरस पड़ी
| वो कीमिया-गरी तिरे जमाल की बरस पड़ी
| मैं सैल-ए नूर-ए अंदरूँ से धुल गया!
| मिरे दिरूँ की ख़ल्क़ यूँ गली गली निकल पड़ी
| कि जैसे सुब्ह की अज़ाँ सुनाई दी!
| तमाम कूज़े बनते बनते "तू" ही बन-के रह गए
| नशात इस विसाल-ए रह-गुज़र की ना-गहाँ मुझे निगल गई—
| यही पयाला‐ओ‐सराही‐ओ‐सबू का मर्हला है वो
|     कि जब ख़मीर-ए आब‐ओ‐गिल से वो जुदा हुए
|     तो उन को सिम्त-ए राह-ए नौ का कामरानियाँ मिलें—
|     (मैं इक ग़रीब कूज़ा-गर
|                 ये इंतिहा-ए मारिफ़त
| ये हर पयाला‐ओ‐सराही‐ओ‐सबू की इंतिहा-ए मारिफ़त
|             मुझे हो इस की क्या ख़बर?)
| 
| जहान-ज़ाद,
|     इंतिज़ार आज भी मुझे है क्यों वही मगर
|         जो नौ-बरस के दौर-ए ना-सज़ा में था?
| अब इंतिज़ार आंसुओं के दज्ला का
|             न गुमरही की रात का
| (शब-ए गुनह की लज़्ज़तों का इतना ज़िक्र कर चुका
|             वो ख़ुद गुनाह बन गईं!)
| हलब की कारवां-सरा के हौज़ का, न मौत का
|     न अपनी इस शिकस्त-ख़ुर्दा ज़ात का
| इक इंतिज़ार-ए बे-ज़माँ का तार है बंधा हुआ!
| कभी जो चंद सानिये ज़मान-ए बे-ज़माँ में आ-के रुक गए
| तो वक़्त का ये बार मेरे सर से भी उतर गया
| तमाम रफ़्ता‐ओ‐गुज़श्ता सूरतों, तमाम हादिसों
|             के सुस्त क़ाफ़िले
| मिरे दिरूँ में जाग उठे
| मिरे दिरूँ में इक जहान-ए बाज़-याफ़्ता की रेल-पेल जाग उठी
| बिहिश्त जैसे जाग उठे ख़ुदा के ला-शुूर में!
| मैं जाग उठा ग़नूदगी की रेत पर पड़ा हुआ
| ग़नूदगी की रेत पर पड़े हुए वो कूज़े जो
|         —मिरे वुजूद से बिरूँ—
| तमाम रेज़ा रेज़ा हो-के रह गए थे
|     मेरे अपने आप से फ़िराक़ में,
| वो फिर से एक कुल बने (किसी नवा-ए साज़-गार की तरह)
| वो फिर से एक रक़्स-ए बे-ज़माँ बने
|             वो रोयत-ए अज़ल बने!

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