.. title: §26ـ हसन कूज़ा-गर
.. slug: itoohavesomedreams/poem_26
.. date: 2016-03-02 15:55:18 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Ḥasan kūzah-gar"
.. type: text



| जहाँ-ज़ाद, नीचे गली में तिरे दर के आगे
| ये मैं सोख़्ता-सर हसन कूज़ा-गर हूँ!
| तुझे सुब्ह बाज़ार में बूड़े अततार यूसिफ़
| की दुककान पर मैं ने देखा
| तो तेरी निगाहों में वो ताबनाकी
| थी मैं जिस की हसरत में नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँ
| जहाँ-ज़ाद, नौ साल दीवाना फिरता रहा हूँ!
| ये वो दौर था जिस में मैं ने
| कभी अपने रंजूर कूज़ों की जानिब
| पलट-कर न देखा—
| वो कूज़े मिरे दस्त-ए चाबुक के पुतले
| गिल‐ओ‐रंग‐ओ‐रौग़न की मख़लूक़-ए बे-जाँ
| वो सर-गोशियों में ये कहते:
| "हसन कूज़ा-गर अब कहाँ है?
| वो हम से, ख़ुद अपने अमल से,
| ख़ुदावंद बन-कर ख़ुदाओं के मानिंद है रू-ए गर्दां!"
| जहाँ-ज़ाद नौ साल का दौर यूँ मुझ पे गुज़रा
| कि जैसे किसी शहर-ए मदफ़ून पर वक़्त गुज़रे;
| तग़ारों में मिटटी
| कभी जिस की ख़ुश-बू से वा-रफ़्ता होता था में
|             संग-बस्ता पड़ी थी
| सुराही‐ओ‐मीना‐ओ‐जाम‐ओ‐सबू और फ़ानूस‐ओ‐गुलदाँ
| मिरी हेच-माया मीशत के, इज़्हार-ए फ़न के सहारे
| शिकस्ता पड़े थे
| मैं ख़ुद, मैं हसन कूज़ा-गर पा ब गिल, ख़ाक बर सर, बरहना,
| सर-ए "चाक" झ़ूलीदा मू, सर बज़ानू,
| किसी ग़मज़दा देवता की तरह वाहिमा के
| गिल‐ओ‐ला से ख़्वाबों के सैयाल कूज़े बनाता रहा था—
| जहाँ-ज़ाद, नौ साल पहले
| तू ना-दाँ थी लेकिन तुझे ये ख़बर थी
| कि मैं ने, हसन कूज़ा-गर ने
| तिरी क़ाफ़ की सी उफ़क़-ताब आंखों 
| में देखी है वो ताबनाकी कि जिस से मिरे जिस्म‐ओ‐जाँ, अब्र‐ओ‐महताब का
|             रहगुज़र बन गए थे
| जहाँ-ज़ाद बग़दाद की ख़्वाब गूँ रात,
| वो रोद-ए दज्ला का साहिल,
| वो कशती, वो मल्लाह की बंद आंखें,
| किसी ख़स्ता-जाँ, रंज्बर, कूज़ा-गर के लिए
| एक ही रात वो कहरुबा थी
| कि जिस से अभी तक है पैवस्त उस का वुजूद—
|             उस की जाँ, उस का पैकर
| मगर एक ही रात का ज़ौक़ दरया की वो लहर निकला
| हसन कूज़ा-गर जिस में डूबा तो उभ्रा नहीं है!
| 
| जहाँ-ज़ाद, उस दौर में रोज़, हर रोज़
|             वो सोख़्ता-बख़्त आ-कर
| मुझे देखती चाक पर पा ब-गिल, सर बज़ानू,
| तो शानों से मुझ को हिलाती—
| (वही चाक जो सालहासाल जीने का तंहा सहारा रहा था!)
| वो शानों से मुझ को हिलाती:
| "हसन कूज़ा-गर होश में आ
| हसन अपने वीरान घर पर नज़र कर
| ये बचचों के तन्नूर क्योंकर भरेंगे?
| हसन, ऐ मुहब्बत के मारे
| मुहब्बत अमीरों की बाज़ी,
| हसन, अपने दीवार‐ओ‐दर पर नज़र कर"
| मिरे कान में ये नवा-ए हज़ीं यूँ थी जैसे
| किसी डूबते शख़्स को ज़ेर-ए गिर्दाब कोई पुकारे!
| वो अश्कों के अंबार फूलों के अंबार थे हाँ
| मगर मैं हसन कूज़ा-गर शहर-ए औहाम के उन 
| ख़राबों का मजज़ूब था जिन
| में कोई सदा कोई जुंबिश
| किसी मुर्ग़-ए पर्रां का साया
| किसी ज़िंदगी का निशाँ तक नहीं था!
| 
| जहाँ-ज़ाद, में आज तेरी गली में
| यहाँ रात की सर्द-गूँ तीरगी में
| तिरे दर के आगे खड़ा हूँ
| सर‐ओ‐मू परेशाँ
| दरीचे से वो क़ाफ़ की सी तिलिस्मी निगाहें
| मुझे आज फिर झांकती हैं
| ज़माना, जहाँ-ज़ाद वो चाक है जिस पे मीना‐ओ‐जाम‐ओ‐सबू
|             और फ़ानूस‐ओ‐गुलदाँ
| के मानिंद बनते बिगड़ते हैं इंसाँ
| मैं इंसाँ हूँ लेकिन
| ये नौ साल जो ग़म के क़ालिब में गुज़रे!
| हसन कूज़ा-गर आज इक तोदा-ए ख़ाक है जिस
| में नम का असर तक नहीं है
| जहाँ-ज़ाद बाज़ार में सुब्ह अततार यूसिफ़
| की दुककान पर तेरी आंखें
| फिर इक बार कुछ कह गई हैं
| इन आंखों की ताबिंदा शोख़ी
| से उट्ठी है फिर तोदा-ए ख़ाक में नम की हलकी सी लर्ज़िश
| यही शायद इस ख़ाक को गिल बना दे!
| 
| तमन्ना की वुस्अत की किस को ख़बर है, जहाँ-ज़ाद लेकिन
| तू चाहे तो बन जाऊँ में फिर
| वही कूज़ा-गर जिस के कूज़े
| थे हर काख़‐ओ‐कू और हर शहर‐ओ‐क़र्या की नाज़िश
| थे जिन से अमीर‐ओ‐गदा के मुसाकिन दरख़शाँ
| तमन्ना की वुस्अत की किस को ख़बर है
| जहाँ-ज़ाद लेकिन
| तू चाहे तो मैं फिर पलट जाऊँ उन अपने महजूर कूज़ों की जानिब
| गिल‐ओ‐ला के सूखे तग़ारों की जानिब
| मीशत के, इज़्हार-ए फ़न के सहारों की जानिब
| कि मैं उस गिल‐ओ‐ला से, उस रंग‐ओ‐रौग़न
| से फिर वो शरारे निकालूँ कि जिन से
| दिलों के ख़राबे हों रोशन!

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