.. title: §25ـ गुमाँ का मुम्किन—जो तू है मैं हूँ!
.. slug: itoohavesomedreams/poem_25
.. date: 2016-03-02 15:55:18 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Gumāñ kā mumkin—jo tū hai maiñ hūñ!"
.. type: text



| करीम सूरज,
|     जो ठंडे पत्थर को अपनी गोलाई
|             दे रहा है
|     जो अपनी हमवारी दे रहा है—
| (वो ठंडा पत्थर जो मेरे मानिंद
|         भूरे सबज़ों में
|     दौर-ए रेग‐ओ‐हवा की यादों में लौटता है)
| जो बहते पानी को अपनी दरया-दिली की
|         सरशारी दे रहा है
| —वही मुझे जानता नहीं है
| मगर मुझी को ये वहम शायद
|     कि आप अपना सुबूत अपना जवाब हूँ मैं!
| मुझे वो पहचानता नहीं है
| कि मेरी धीमी सदा
| ज़माने की झील के दूसरे किनारे
|                 से आ रही है
| 
| ये झील वो है कि जिस के ऊपर
|     हज़ारों इंसाँ
|         उफ़क़ के मुतवाज़ी चल रहे हैं
| उफ़क़ के मुतवाज़ी चलने-वालों को पार लाती है
|             वक़्त लहरें—
| जिंहें तमन्ना, मगर, समावी ख़िराम की हो
| उंही को पाताल ज़म्ज़मों की सदा सुनाती हैं
|             वक़्त लहरें
| उंहीं डुबोती हैं वक़्त लहरें!
| तमाम मल्लाह इस सदा से सदा हिरासाँ, सदा गुरीज़ाँ
| कि झील में इक उमूद का चोर छुप-के बैठा है
| उस के गेसू उफ़क़ की छत से लटक रहे हैं—
| पुकारता है: "अब आओ, आओ!
|     अज़ल से मैं मुंतज़र तुम्हारा—
| मैं गुम्बदों के तमाम राज़ों को जानता हूँ
| दरख़्त, मीनार, बुर्ज, ज़ीने मिरे ही साथी
| मिरे ही मुतवाज़ी चल रहे हैं
| मैं हर हवाई जहाज़ का आख़िरी बसीरा
| समंदरों पर जहाज़-रानों का मैं किनारा
| अब आओ, आओ!
| तुम्हारे जैसे कई फ़सानों को मैं ने उन के
|     अबद के आग़ोश में उतारा—"
| तमाम मल्लाह इस की आवाज़ से गुरीज़ाँ
| उफ़क़ की शहराह-ए मुब्तज़िल पर तमाम सहमे हुए ख़िरामाँ—
| मगर समावी ख़िराम-वाले
| जो पस्त‐ओ‐बाला के आस्ताँ पर जमे हुए हैं
| उमूद के इस तनाब ही से उतर रहे हैं
| इसी को थामे हुए बुलंदी पे चड़ रहे हैं!
| 
| इसी तरह मैं भी साथ इन के उतर गया हूँ
| और ऐसे साहिल पर आ लगा हूँ
| जहाँ ख़ुदा के निशान-ए पा ने पनाह ली है
| जहाँ ख़ुदा की ज़ीफ़ आंखें
|     अभी सलामत बची हुई हैं
| यही समावी ख़िराम मेरा नसीब निकला
|     यही समावी ख़िराम जो मेरी आर्ज़ू था—
| 
| मगर नजाने
|     वो रास्ता क्यों चुना था मैं ने
| कि जिस पे ख़ुद से विसाल तक का गुमाँ नहीं है?
| वो रास्ता क्यों चुना था मैं ने
| जो रुक गया है दिलों के इबहाम के किनारे?
| वही किनारा कि जिस के आगे गुमाँ का मुम्किन
|             जो तू है मैं हूँ!
| 
| मगर ये सच है,
| मैं तुझ को पाने की (ख़ुद को पाने की) आर्ज़ू में
|     निकल पड़ा था
| उस एक मुम्किन की जुस्तजू में
|         जो तू है मैं हूँ
| मैं ऐसे चेहरे को धूंडता था
|         जो तू है मैं हूँ
| मैं ऐसी तस्वीर के तआक़ुब में घूमता था
|         जो तू है मैं हूँ!
| 
| मैं इस तआक़ुब में
|     कितने आग़ाज़ गिन चुका हूँ
| (मैं उस से डरता हूँ जो ये कहता
|         है मुझ को अब कोई डर नहीं है)
| मैं इस तआक़ुब में कितनी गलयों से
|             कितने चौकों से,
| कितने गूंगे मुजस्सिमों से, गुज़र गया हूँ
| मैं इस तआक़ुब में कितने बाग़ों से,
|         कितनी अंधी शराब रातों से
|             कितनी बाहों से,
| कितनी चाहत के कितने बिफरे समंदरों से
|                 गुज़र गया हूँ
| मैं कितनी होश‐ओ‐अमल की शमों से,
|         कितने ईमाँ के गुंबदों से
|             गुज़र गया हूँ
| मैं इस तआक़ुब में कितने आग़ाज़ कितने अंजाम गिन चुका हूँ—
| अब इस तआक़ुब में कोई दर है
|     न कोई आता हुआ ज़माना
| हर एक मंज़िल जो रह गई है
|         फ़क़त गुज़रता हुआ फ़साना
| तमाम रस्ते, तमाम पूछे सवाल, बे-वज़्न हो चुके हैं
| जवाब, तारीख़ रूप धारे
|     बस अपनी तकरार कर रहे हैं—
| "जवाब हम हैं—जवाब हम हैं—
| हमें यक़ीं है जवाब हम हैं—"
| यक़ीं को कैसे यक़ीं से दुहरा रहे हैं कैसे!
| मगर वो सब आप अपनी ज़िद हैं
|     तमाम, जैसे गुमाँ का मुम्किन
|         जो तू है मैं हूँ!
| 
| तमाम कुंदे (तू जानती है)
| जो सत्ह-ए दरया पे साथ दरया के तैरते हैं
| ये जानते हैं ये हादिसा है,
|         कि जिस से इन को,
|     (किसी को) कोई मफ़र नहीं है!
| तमाम कुंदे जो सत्ह-ए दरया पे तैरते हैं,
| नहंग बन्ना—ये उन की तक़दीर में नहीं है
| (नहंग की इब्तिदा में है इक नहंग शामिल
|     नहंग का दिल नहंग का दिल!)
| न उन की तक़दीर में है फिर से दरख़्त बन्ना
| (दरख़्त की इब्तिदा में है इक दरख़्त शामिल
|     दरख़्त का दिल दरख़्त का दिल!)
| तमाम कुंदों के सामने बंद वापसी की
|         तमाम राहें
| वो सत्ह-ए दरया पे जब्र-ए दरया से तैरते हैं
| अब इन का अंजाम घाट हैं जो
|     सदा से आग़ोश वा किये हैं
| अब इन का अंजाम वो सफ़ीने
| अभी नहीं जो सफ़ीना-गर के क़ियास में भी
| अब इन का अंजाम
|     ऐसे औराक़ जिन पे हर्फ़-ए सियह छपेगा
| अब इन का अंजाम वो किताबें—
| कि जिन के क़ारी नहीं, न होंगे
| अब इन का अंजाम ऐसे सूरत-गरों के पर्दे
|     अभी नहीं जिन के कोई चेहरे
|         कि उन पे आंसू के रंग उत्रें,
| और उन में आयिंदा
|     उन के रोया के नक़्श भर दे!
| 
| ग़रीब कुंदों के सामने बंद वापसी की
|             तमाम राहें
| बक़ा-ए मौहूम के जो रस्ते खुले हैं अब तक
| है उन के आगे गुमाँ का मुम्किन—
| गुमाँ का मुम्किन, जो तू है मैं हूँ!
|         जो तू है, मैं हूँ!

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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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