.. title: §18ـ दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल
.. slug: itoohavesomedreams/poem_18
.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Dil, mire ṣaḥrā-navard-e pīr dil"
.. type: text



| नग़्मा दर जाँ, रक़्स बर पा, ख़ंदा बर लब
| दिल, तमन्नाओं के बे-पायाँ अलाओ के क़रीब!
| 
| दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल
| रेग के दिलशाद शहरी, रेग तू
|     और रेग ही तेरी तलब
| रेग की नकहत तिरी पैकर में, तेरी जाँ में है!
| 
| रेग सुब्ह-ए ईद के मानिंद ज़र-ताब‐ओ‐जलील,
| रेग सदयों का जमाल,
| जश्न-ए आदम पर बिछड़-कर मिलने-वालों का विसाल,
| शौक़ के लम्हात के मानिंद आज़ाद‐ओ‐अज़ीम!
| 
| रेग नग़्मा-ज़न
| कि ज़र्रे रेग-ज़ारों की वो पा-ज़ेब-ए क़दीम
| जिस पे पड़ सकता नहीं दस्त-ए लईम,
| रेग-ए सहरा ज़र-गरी की रेग की लहरों से दूर
| चश्मा-ए मक्र‐ओ‐रिया शहरों से दूर!
| 
| रेग शब बेदार है, सुनती है हर जाबिर की चाप
| रेग शब बेदार है, निगराँ है मानिंद-ए नक़ीब
| देखती है साया-ए आमिर की चाप
| रेग हर अययार, ग़ारत-गर की मौत
| रेग इस्तिबदाद के तुग़याँ के शोर‐ओ‐शर की मौत
| रेग जब उठती है, उड़ जाती है हर फ़ातिह की नींद
| रेग के नेज़ों से ज़ख़्मी, सब शहंशाहों के ख़्वाब!
| 
| (रेग, ऐ सहरा की रेग
| मुझ को अपनी जागते ज़र्रों के ख़्वाबों की
|         नई ताबीर दे!)
| 
| रेग के ज़र्रो, उभरती सुब्ह तुम,
| आओ सहरा की हदों तक आ गया रोज़-ए तरब
| दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल,
|         आ चूम रेग!
| है ख़यालों के परीज़ादों से भी मासूम रेग!
| 
| रेग रक़साँ, माह‐ओ‐साल-ए नूर तक रक़साँ रहे
| उस का अब्रेशम मलाइम, नर्म-ख़ू, ख़ंदाँ रहे!
| 
| दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल
| ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ
| राह-गुम-कर्दों की मश्अल, उस के लब पर "आओ! आओ!"
| तेरे माज़ी के ख़ज़िफ़ रेज़ों से जागी है ये आग
| आग की क़िर्मिज़ ज़बाँ पर इंबिसात-ए नौ के राग
| दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल,
| सर-गरानी की शब-ए रफ़्ता से जाग!
| कुछ शरर आग़ोश-ए सर्सर में हैं गुम,
| और कुछ ज़ीना ब ज़ीना शोलों के मीनार पर चड़ते हुए
| और कुछ तह में अलाओ की अभी,
| मुज़्तरिब, लेकिन मुज़ब्ज़ब तिफ़्ल-ए कमसिन की तरह!
| आग ज़ीना, आग रंगों का ख़ज़ीना
| आग उन लज़्ज़ात का सरचश्मा है
| जिस से लेता है ग़ज़ा उशशाक़ के दिल का तपाक!
| चोब-ए ख़ुश्क अंगोर, उस की मै है आग
| सर्सराती है रगों में ईद के दिन की तरह!
| 
| आग काहिन, याद से उत्री हुई सदयों की ये अफ़्साना-ख़्वाँ
| आने-वाले क़र्नहा की दास्तानें लब पे हैं
| दिल, मिरा सहरा-नवर्द-ए पीर दिल सुन-कर जवाँ!
| 
| आग आज़ादी का, दिल-शादी का नाम
| आग पैदाइश का, अफ़्ज़ाइश का नाम
| आग के फूलों में नसरीं, यास्मिन, सुम्बुल, शक़ीक़‐ओ‐नस्तरन
| आग आराइश का, ज़ेबाइश का नाम
| आग वो तक़दीस, धुल जाते हैं जिस से सब गुनाह
| आग इंसानों की पहली सांस के मानिंद इक ऐसा करम
| उम्र का इक तूल भी जिस का नहीं काफ़ी जवाब!
| 
| ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ गर न हो
| इस लक़‐ओ‐दक़ में निकल आएँ कहीं से भेड़िये
| इस अलाओ को सदा रोशन रखो!
| (रेग-ए सहरा को बशारत हो कि ज़िंदा है अलाओ,
| भेड़ियों की चाप तक आती नहीं!)
| 
| आग से सहरा का रिश्ता है क़दीम
| आग से सहरा के टेड़े, रेंगने-वाले,
|         गिरह-आलूद, झ़ूलीदा दरख़्त
| जागते हैं नग़्मा दर जाँ, रक़्स बर-पा, ख़ंदा बर-लब
| और मना लेते हैं तंहाई में जश्न-ए माहताब
| उन की शाख़ें ग़ैर मरई तब्ल की आवाज़ पर देती हैं ताल
| बेख़‐ओ‐बुन से आने लगती है ख़ुदावंदी जलाजिल की सदा!
| 
| आग से सहरा का रिश्ता है क़दीम
| रहरौओं, सहरा-नवर्दों के लिए है रहनुमा
| कारवानों का सहारा भी है आग
| और सहराओं की तंहाई को हम करती है आग!
| 
| आग के चारों तरफ़ पशमीना‐ओ‐दस्तार में लिपटे हुए
|                 अफ़्साना-गो
| जैसे गिर्द-ए चस्म मिझ़गाँ का हुजूम;
| उन के हैरत-नाक, दिलकश तज्रिबों से
|                 जब दमक उठती है रेत,
| ज़र्रा ज़र्रा बजने लगता है मिसाल-ए साज़-ए जाँ
| गोश बर आवाज़ रहते हैं दरख़्त
| और हंस देते हैं अपनी आरिफ़ाना बे-नियाज़ी से कभी!
| 
| ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ गर न हो
| रेग अपनी ख़ल्वत-ए बे-नूर‐ओ‐ख़ुद-बीं में रहे
| अपनी यकताई की तहसीं में रहे
| इस अलाओ को सदा रोशन रखो!
| 
| ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ गर न हो
| एशिया, अफ़्रीक़ा पहनाई का नाम
|         (बे-कार पहनाई का नाम)
| यूरोप और अम्रीका दाराई का नाम
|         (तकरार-ए दाराई का नाम!)
| 
| मेरा दिल, सहरा नवर्द-ए पीर दिल
| जाग उठा है, मशरिक़‐ओ‐मग़्रिब की ऐसी यक-दिली
|     के कारवानों का नया रोया लिए:
| यक-दिली ऐसी कि होगी फ़हम-ए इंसाँ से वरा
| यक-दिली ऐसी कि हम सब कह उठें
|     "इस क़दर उज्लत न कर
|     इझ़्दिहाम-ए गुल न बन!"
| कह उठें हम:
|     "तू ग़म-ए कुल तो न थी
|     अब लज़्ज़त-ए कुल भी न बन
|     रोज़-ए आसाइश की बे-दर्दी न बन
|     यक-दिली बन, ऐसा सुन्नाटा न बन,
|     जिस में ताबिस्ताँ की दो-पहरों की
|     बे-हासिल कसालत के सिवा कुछ भी न हो!"
| 
| इस "जफ़ा-गर" यक-दिली के कारवां यूँ आएंगे
| दस्त-ए जादू-गर से जैसे फूट निकले हों तिलिस्म,
| इश्क़-ए हासिल-ख़ेज़ से, या ज़ोर-ए पैदाई से जैसे ना-गहाँ
| खुल गए हों मशरिक़‐ओ‐मग़्रिब के जिस्म,
|     —जिस्म, सदयों के अक़ीम!
| 
| कारवां फ़र्ख़ुंदा पै, और उन का बार
| कीसा कीसा तख़्त-ए जम‐ओ‐ताज-ए कै
| कूज़ा कूज़ा फ़र्द की सत्वत की मै
| जामा जामा रोज़‐ओ‐शब मेहनत का ख़ै
| नग़्मा नग़्मा हुर्रियत की गर्म लै!
| 
| सालिको, फ़ीरोज़-बख़्तो, आने-वाले क़ाफ़िलो
| शहर से लौटोगे तुम तो पाओगे
| रेत की सरहद पे जो रूह-ए अबद ख़्वाबीदा थी
| जाग उठी है "शिक्वा‐हा-ए- नै" से वो
| रेत की तह में जो शर्मीली सहर रोईदा थी
| जाग उठी है हुर्रियत की लै से वो!
| 
| इत्नी दोशीज़ा थी, इत्नी मर्द ना-दीदा थी सुब्ह
| पूछ सकते थे न उस की उम्र हम!
| दर्द से हंसती न थी,
| ज़र्रों की रानाई पे भी हंसती न थी,
| एक महजूबाना बे-ख़बरी में हंस देती थी सुब्ह!
| अब मनाती है वो सहरा का जलाल
| जैसे अज़्ज़‐ओ‐जल के पाओं की यही मेहराब हो!
| ज़ेर-ए मेहराब आ गई हो उस को बेदारी की रात
| ख़ुद जनाब-ए अज़्ज़‐ओ‐जल से जैसे उम्मीद-ए ज़िफ़ाफ़
|     (सारे ना-कर्दा गुनाह उस के मआफ़!)
| 
| सुब्ह-ए सहरा, शाद-बाद!
| ऐ अरूस-ए अज़्ज़‐ओ‐जल, फ़र्ख़ुंदा रू, ताबिंदा ख़ू
| तू इक ऐसे हुज्रा-ए शब से निकल-कर आई है
| दस्त-ए क़ातिल ने बहाया था जहाँ हर सेज पर
| सैंकड़ों तारों का रुख़्शंदा लहू, फूलों के पास!
| सुब्ह-ए सहरा, सर मिरे ज़ानू पे रख-कर दास्ताँ
| उन तमन्ना के शहीदों की न कह
| उन की नीमा-रस उमंगों, आर्ज़ुओं की न कह
| जिन से मिलने का कोई इम्काँ नहीं
| शहद तेरा जिन को नोश-ए जाँ नहीं!
| आज भी कुछ दूर, इस सहरा के पार
| देव की दीवार के नीचे नसीम
| रोज़‐ओ‐शब चलती है मुबहम ख़ौफ़ से सहमी हुई
| जिस तरह शहरों की राहों पर यतीम
| नग़्मा बर-लब ता कि उन की जाँ का सुन्नाटा हो दूर!
| 
| आज भी इस रेग के ज़र्रों में हैं
| ऐसे ज़र्रे, आप ही अपने ग़नीम
| आज भी इस आग के शोलों में हैं
| वो शरर जो इस की तह में पर-बरीदा रह गए
|     मिस्ल-ए हर्फ़-ए ना-शुनीदा रह गए!
| सुब्ह-ए सहरा, ऐ अरूस-ए अज़्ज़‐ओ‐जल
| आ कि उन की दास्ताँ दुहराएँ हम
| उन की इज़्ज़त, उन की अज़्मत गाएँ हम
| 
| सुब्ह, रेत और आग, हम सब का जलाल!
| यक-दिली के कारवां उन का जमाल
|     आओ!
| इस तहलील के हलक़े में हम मिल जाएँ
|     आओ!
| शाद-बाद अपनी तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ!

|left arrow link|_

|right arrow link|_



.. |left arrow link| replace:: :emoji:`arrow_left` §17. ज़िंदगी से डरते हो? 
.. _left arrow link: /hi/itoohavesomedreams/poem_17

.. |right arrow link| replace::  §19. एक और शहर :emoji:`arrow_right` 
.. _right arrow link: /hi/itoohavesomedreams/poem_19

.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


  .. link_figure:: /itoohavesomedreams/
        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
        :class: link-figure
        :image_url: /galleries/i2havesomedreams/i2havesomedreams-small.jpg
        
.. _جمیل نوری نستعلیق فانٹ: http://ur.lmgtfy.com/?q=Jameel+Noori+nastaleeq
 

