.. title: §16ـ वो हर्फ़-ए तंहा (जिसे तमन्ना-ए वस्ल-ए माना)
.. slug: itoohavesomedreams/poem_16
.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Vuh ḥarf-e tanhā (jise tamannā-e vaṣl-e maʿnā)"
.. type: text



| हमारे आज़ा जो आस्माँ की तरफ़ दुआ के लिये उठे हैं,
| (तुम आस्माँ की तरफ़ न देखो!)
| मक़ाम-ए नाज़ुक पे ज़र्ब-ए कारी से जाँ बचाने का है वसीला
| कि अपनी महरूमियों से छुपने का एक हीला?
| बुज़ुर्ग‐ओ‐बर-तर ख़ुदा कभी तो (बिहिश्त बर-हक़,)
| हमें ख़ुदा से नजात देगा
| कि हम हैं इस सर-ज़मीं पे जैसे वो हर्फ़-ए तंहा,
| (मगर वो ऐसा जहाँ न होगा) ख़मोश‐ओ‐गोया,
| जो आर्ज़ू-ए विसाल-ए मानी में जी रहा हो
| जो हर्फ़‐ओ‐मानी की यक-दिली को तरस गया हो!
| 
| हमें मर्री के ख़्वाब दे दो
| (कि सब को बख़शें बक़द्र-ए ज़ौक़-ए निगह तबस्सुम)
| हमें मर्री की रूह का इज़्तिराब दे दो
| (जहाँ गुनाहों के हौसले से मिले तक़द््दुस के दुख का मरहम)
| कि उस की बे-नूर‐ओ‐तार आंखें
|     दिरून-ए आदम की तीरा रातों
|             को छेदती थीं
| उसी जहाँ में फ़िराक़-ए जाँ-काह-ए हर्फ़‐ओ‐मानी
|                 को देखती थीं
| बिहिश्त उस के लिये वो मासूम सादा लौहों की आफ़ियत था
| जहाँ वो नंगे बदन पे जाबिर के ताज़ियानों से बच-के
|                     राह-ए फ़रार पाएँ
| वो कफ़्श-ए पा था, कि जिस से ग़ुर्बत की रेग-ए हज़याँ
|                 से रोज़-ए फ़ुर्सत क़रार पाएँ
| कि सुल्ब-ए आदम की, रेहम-ए हव्वा की उज़्लतों में
|                     निहायत-ए इंतिज़ार पाएँ!
| 
| (बिहिश्त सिफ़्र-ए अज़ीम, लेकिन हमें वो गुम-गश्ता हंदसे हैं
| बग़ैर जिन के कोई मसावात क्या बनेगी
| विसाल-ए मानी से हर्फ़ की बात क्या बनेगी?)
| हम इस ज़मीं पर अज़ल से पीराना सर हैं, माना
| मगर अभी तक हैं दिल तवाना
| और अपनी झ़ूलीदा कारियों के तुफ़ैल दाना
| हमें मर्री के ख़्वाब दे दो
| (बिहिश्त में भी नशात, यक-रंग हो तो, ग़म है
| हो एक सा जाम-ए शहद सब के लिये तो सम है)
| कि हम अभी तक हैं इस जहाँ में वो हर्फ़-ए तंहा
| (बिहिश्त रख लो, हमें ख़ुद अपना जवाब दे दो!)
| जिसे तमन्ना-ए वस्ल-ए माना...

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.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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