.. title: §15ـ नमरूद की ख़ुदाई
.. slug: itoohavesomedreams/poem_15
.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Namrūd kī ḳhudāʾī"
.. type: text



| ये क़ुद्सियों की ज़मीं
| जहाँ फ़ल्सफ़ी ने देखा था, अपने ख़्वाब-ए सहर-गही में,
| हवा-ए ताज़ा‐ओ‐किश्त-ए शादाब‐ओ‐चश्मा-ए जाँ-फ़िरोज़ की आर्ज़ू का पर्तव!
| यिहीं मुसाफ़िर पहुंच के अब सोचने लगा है:
|     "वो ख़्वाब काबूस तो नहीं था?
|     —वो ख़्वाब काबूस तो नहीं था?
| 
| ऐ फ़ल्सफ़ा-गो,
|     कहाँ वो रोया-ए आस्मानी?
|     कहाँ ये नमरूद की ख़ुदाई!
| तू जाल बुनता रहा है, जिन के शिकस्ता तारों से अपने मौहूम फ़ल्सफ़े के
| हम उस यक़ीं से, हम उस अमल से, हम उस मुहब्बत से,
| आज मायूस हो चुके हैं!
| 
| कोई ये किस से कहे कि आख़िर
| गवाह किस अद्ल-ए बे-बहा के थे अहद-ए तातार के ख़राबे?
|     अजम, वो मर्ज़-ए तिलिस्म‐ओ‐रंग‐ओ‐ख़याल‐ओ‐नग़्मा
|     अरब, वो इक़्लीम-ए शीर‐ओ‐शहद‐ओ‐शराब‐ओ‐ख़ुर्मा
|     फ़क़त नवा-संज थे दर‐ओ‐बाम के ज़ियाँ के
|     जो उन पे गुज़री थी
| उस से बद-तर दिनों के हम सैद-ए ना-तवाँ हैं!
| 
| कोई ये किस से कहे:
|     दर‐ओ‐बाम,
|         आहन‐ओ‐चोब‐ओ‐संग‐ओ‐सीमाँ के
|             हुस्न-ए पैवंद का फ़ुसूँ थे
|     बिखर गया वो फ़ुसूँ तो क्या ग़म?
|     और ऐसे पैवंद से उमीद-ए वफ़ा किसे थी?
| 
| शिकस्त-ए मीना‐ओ‐जाम बर-हक़,
| शिकस्त-ए रंग-ए इज़ार-ए महबूब भी गवारा
| मगर—यहाँ तो खंडर दिलों के,
| (—ये नौ-ए इंसाँ की
|     कह-कशाँ से बुलंद‐ओ‐बर-तर तलब के उज्ड़े हुए मदाइन—)
| शिकस्त-ए आहंग-ए हर्फ़‐ओ‐मानी के नौहा-गर हैं!
| 
| मैं आने-वाले दिनों की दहशत से कांपता हूँ
| मिरी निगाहें ये देखती हैं
| कि हर्फ़‐ओ‐मानी के रब्त का
|     ख़्वाब-ए लज़्ज़त-आगीं बिखर चुका है,
| कि रास्ते नीम-होश्मंदों से,
| नींद में राह-पो गदाओं से
| "सूफ़ियों" से भरे पड़े हैं
| हयात ख़ाली है आर्ज़ू से
| हमारी तहज़ीब, कुहना बीमार जाँ बलब है!

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.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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.. _جمیل نوری نستعلیق فانٹ: http://ur.lmgtfy.com/?q=Jameel+Noori+nastaleeq
 

