.. title: §13ـ मंन ‐ओ‐ सलवा
.. slug: itoohavesomedreams/poem_13
.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Mann-o-salvâ"
.. type: text



| "ख़ुदा-ए बर-तर,
| ये दारियूश-ए बुज़ुर्ग की सर-ज़मीं,
| ये नौशीरवान-ए आदिल की दाद-गाहें,
| तसव्वुफ़‐ओ‐हिक्मत‐ओ‐अदब के निगार-ख़ाने,
| ये क्यों सियह-पोस्त दुश्मनों के वुजूद से
| आज फिर उबलते हुए से नासूर बन रहे हैं?"
| 
| "हम इस के मुज्रिम नहीं हैं, जान-ए अजम नहीं हैं
| वो पहला अंग्रेज़
| जिस ने हिंदूस्ताँ के साहिल पे
| ला-के रक्खी थी जिंस-ए सौदागरी
| ये उस का गुनाह है
| जो तिरे वतन की
| ज़मीन-ए गुल-पोश को
| हम अपने सियाह क़दमों से रौंदते हैं!
| 
| ये शहर अपना वतन नहीं है,
| मगर फ़रंगी की रहज़नी ने
| उसी से ना-चार हम को वा-बस्ता कर दिया है,
| हम उस की तहज़ीब की बुलंदी की छिपकली बन-के रह गए हैं!
| 
| वो राहज़न जो ये सोचता है:
| "कि एशिया है कोई अक़ीम‐ओ‐अमीर बीवा
| जो अपनी दौलत की बे-पनाही से मुब्तला इक फ़शार में है,
| और उस का आग़ोश-ए आर्ज़ू-मंद वा मिरे इंतिज़ार में है,
| और एशियाई,
| क़दीम ख़्वाजा-सराओं की इक नझ़ाद-ए काहिल,
| अजल की राहों पे तेज़-गामी से जा रहे हैं"—
| 
| मगर ये हिंदी
| गुरिस्ना‐ओ‐पा बरहना हिंदी
| जो सालिक-ए राह हैं
| मगर राह‐ओ‐रस्म-ए मंज़िल से बे-ख़बर हैं
| घरों को वीरान कर-के,
| लाखों सुूबतों सह-के
| और अपना लहू बहा-कर
| अगर कभी सोचते हैं कुछ तो यही,
| —कि शायद उंही के बाज़ू
| नजात दिलवा सकेंगे मशरिक़ को
| ग़ैर के बे-पनाह बिफरे हुए सितम से—
| ये सोचते हैं:
| —ये हादिसा ही कि जिस ने फेंका है
| ला-के उन को तिरे वतन में
| वो आंच बन जाए,
| जिस से फुंक जाए,
| वो जरासीम का अखाड़ा,
| जहाँ से हर बार जंग की बू-ए तुंद उठती है
| और दुनिया में फैलती है!—
| 
| मैं जानता हूँ
| मिरे बहुत से रफ़ीक़
| अपनी उदास, बे-कार ज़िंदगी के
| दिराज़‐ओ‐तारीक फ़ासिलों में
| कभी कभी भेड़ियों के मानिंद
| आ निकलते हैं, रहगुज़ारों पे
| जुस्तजू में किसी के दो "साक़-ए संदलीं" की!
| कभी दरीचों की ओट में
| ना-तवाँ पतंगों की फड़्फड़ाहट पे
| होश से बे-नियाज़ हो-कर वो टूटते हैं;
| वो दस्त-ए साइल
| जो सामने उन के फैलता है
| इस आर्ज़ू में
| कि उन की बख़्शिश से
| पारा-ए नान, मन‐ओ‐सलवा का रूप भर ले,
| वही कभी अपनी नाज़ुकी से
| वो रह सुझाता है
| जिस की मंज़िल पे शौक़ की तिश्नगी नहीं है!
| 
| तू इन मनाज़िर को देखती है!
| तू सोचती है:
| —ये संगदिल, अपनी बुज़-दिली से
| फ़रंगियों की मुहब्बत-ए ना-रवा की ज़ंजीर में बंधे हैं
| उंही के दम से ये शहर उबलता हुआ सा नासूर बन रहा है—!
| 
| मुहब्बत-ए ना-रवा नहीं है
| बस एक ज़ंजीर,
| एक ही आहनी कमंद-ए अज़ीम
| फैली हुई है,
| मशरिक़ के इक किनारे से दूसरे तक,
| मिरे वतन से तिरे वतन तक,
| बस एक ही अंकबूत का जाल है कि जिस में
| हम एशियाई असीर हो-कर तड़प रहे हैं!
| मुग़ूल की सुब्ह-ए ख़ूँ-फ़िशाँ से
| फ़रंग की शाम-ए जाँ-सिताँ तक!
| तड़प रहे हैं
| बस एक ही दर्द-ए ला-दवा में,
| और अपने आलाम-ए जाँ-गुज़ा के
| इस इश्तिराक-ए गिराँ-बहा ने भी
| हम को इक दूसरे से अब तक
| क़रीब होने नहीं दिया है!

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.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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.. _جمیل نوری نستعلیق فانٹ: http://ur.lmgtfy.com/?q=Jameel+Noori+nastaleeq
 

