.. title: §12ـ तेल के सौदागर
.. slug: itoohavesomedreams/poem_12
.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Tel ke saudāgar"
.. type: text



| बुख़ारा समर्क़ंद इक ख़ाल-ए हिंदू के बदले!
| बजा है, बुख़ारा समर्क़ंद बाक़ी कहाँ हैं?
| बुख़ारा समर्क़ंद नींदों में मद-होश,
| इक नीलगूँ ख़ामुशी के हिजाबों में मस्तूर
| और रहरौओं के लिए उन के दर बंद,
| सोई हुई मह-जबीनों की पलकों के मानिंद,
| रूसी "हमह ऊस्त" के ताज़ियानों से माज़ूर
| दो मह-जबीनें!
| 
| बुख़ारा समर्क़ंद को भूल जाओ
| अब अपने दरख़्शंदा शहरों की
| तहरान‐ओ‐मश्हद के सक़्फ़‐ओ‐दर‐ओ‐बाम की फ़िक्र कर लो,
| तुम अपने नए दौर-ए होश‐ओ‐अमल के दिल-आवेज़ चस्मों को
| अपनी नई आर्ज़ुओं के उन ख़ूब-सूरत किनायों को
| महफ़ूज़ कर लो!
| 
| उन ऊंचे दरख़्शंदा शहरों की
| कोता फ़सीलों को मज़बूत कर लो
| हर इक बुर्ज‐ओ‐बार‐ओ‐पर अपने निगहबाँ चड़ा दो,
| घरों में हवा के सिवा,
| सब सदाओं की शमें बुझा दो!
| कि बाहर फ़सीलों के नीचे
| कई दिन से रहज़न हैं ख़ीमा-फ़िगन,
| तेल के बूड़े सौदागरों के लबादे पहन-कर,
| वो कल रात या आज की रात की तीरगी में,
| चले आएंगे बन-के मेहमाँ
| तुम्हारे घरों में,
| वो दावत की शब जाम‐ओ‐मीना लुंढाएंगे
| नाचेंगे, गाएंगे,
| बे-साख़्ता क़हक़हों हम्हमों से
| वो गर्माएंगे ख़ून-ए महफ़िल!
| 
| मगर पौ फुटेगी
| तो पलकों से खो दोगे ख़ुद अपने मुर्दों की क़बरें
| बिसात-ए ज़ियाफ़त की ख़ाकिस्तर-ए सोख़्ता के किनारे
| बहाओगे आंसू!
| 
| बहाए हैं हम ने भी आंसू!
| —गो अब ख़ाल-ए हिंदू की अर्ज़िश नहीं है
| इज़ार-ए जहाँ पर वो रिस्ता हुआ गहरा नासूर
| अफ़्रंग की आज़-ए ख़ूँ-ख़्वार से बन चुका है—
| बहाए हैं हम ने भी आंसू,
| हमारी निगाहों ने देखे हैं
| सैयाल सायों के मानिंद घुलते हुए शहर
| गिरते हुए बाम‐ओ‐दर
| और मीनार‐ओ‐गुंबद,
| मगर वक़्त मेहराब है
| और दुश्मन अब उस की ख़मीदा कमर से गुज़रता हुआ
| उस के निचले उफ़क़ पर लड़कता चला जा रहा है!
| हमारे बरहना‐ओ‐काहीदा जिस्मों ने
| वो क़ैद‐ओ‐बंद और वो ताज़ियाने सहे हैं
| कि उन से हमारा सितमगर
| ख़ुद अपने अलाओ में जलने लगा है!
| 
| मिरे हाथ में हाथ दे दो!
| मिरे हाथ में हाथ दे दो!
| कि देखी हैं मैं ने
| हिमाला‐ओ‐अल्वंद की चोटियों पर अना की शुआें,
| उंहीं से वो ख़ुरशीद फूटेगा आख़िर
| बुख़ारा समर्क़ंद भी सालहासाल से
| जिस की हसरत के दरयूज़ा-गर हैं!

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.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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.. _جمیل نوری نستعلیق فانٹ: http://ur.lmgtfy.com/?q=Jameel+Noori+nastaleeq
 

