.. title: §11ـ हमह ऊस्त
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.. date: 2016-03-02 15:55:17 UTC
.. tags: poem itoohavesomedreams rashid
.. link: 
.. description: Devanagari version of "Hamah ūst"
.. type: text



| ख़याबान-ए सादी में
| रूसी किताबों की दुककान पर हम खड़े थे
| मुझे रूस के चीदा संअत-गरों के
| नए कार-नामों की इक उम्र से तिश्नगी थी!
| मुझे रूसियों के "सियासी हमह ऊस्त" से कोई रग़्बत नहीं है
| मगर ज़र्रे ज़र्रे में
| इंसाँ के जौहर की ताबिंदगी देखने की तमन्ना हमेशा रही है!
| और उस शाम तो मर्सिदा की अरूसी थी,
| उस शौख़, दीवानी लड़की की ख़ातिर
| मुझे एक नाज़ुक-सी सौग़ात की जुस्त्जू थी—
| 
| वो मेरा नया दोस्त ख़ालिद
| ज़रा दूर, तख़्ते के पीछे खड़ी
| इक तनू-मंद लेकिन फ़ुसूँ-कार,
| क़फ़क़ाज़ की रहने-वाली हसीना से शीर‐ओ‐शकर था!
| ये भूका मुसाफ़िर,
| जो दस्ते के साथ
| एक ख़ीमे में, इक दूर उफ़्तादा सहरा में
| मुद््दत से उज़्लत-गुज़ीं था,
| बड़ी इल्तिजाओं से
| इस हूर-ए क़फ़क़ाज़ से कह रहा था:
| "नजाने कहाँ से मिला है
| तुम्हारी ज़बाँ को ये शहद
| और लहजे को मस्ती!
| मैं कैसे बताऊँ
| मैं किस दर्जा दिलदादा हूँ रूसियों का
| मुझे इश्तिराकी तमद््दुन से कितनी मुहब्बत है,
| कैसे बताऊँ!
| ये मुम्किन है तुम मुझ को रूसी सिका दो?
| कि रूसी अदीबों की सर-चश्मा-गाहों को मैं देखना चाहता हूँ!"
| 
| वो पर्वर्दा-ए अश्वा-बाज़ी
| कनखयों से यूँ देखती थी
| कि जैसे वो उन सर-निगूँ आर्ज़ुओं को पहचानती हो,
| जो करती हैं अक्सर यूँ-ही रू-शिनासी
| कभी दोस्ती की तमन्ना,
| कभी इल्म की प्यास बन-कर!
| वो खोल्हे हिलाती थी, हंसती थी
| इक सोची समझी हिसाबी लगावट से,
| जैसे वो उन ख़ुफ़्या सर-चश्मा-गाहों के हर राज़ को जानती हो,
| वो तख़्ते के पीछे खड़ी, क़हक़हे मारती, लोटती थी!
| 
| कहा मैं ने ख़ालिद से:
| "बहरूपिए!
| इस विलायत में ज़र्ब-ए मसल है
| "कि ओंटों की सौदा-गरी की लगन हो
| तो घर उन के क़ाबिल बनाओ—,
| और इस शहर में यूँ तो उस्तानियाँ अन-गनित हैं
| मगर इस की उज्रत भला तुम कहाँ दे सकोगे!"
| वो फिर मुज़्तरब हो-के, बे-इख़्तियारी से हंसने लगी थी!
| वो बोली:
| "ये सच है
| कि उज्रत तो इक शाही भर कम न होगी,
| मगर फ़ौजियों का भरोसा ही क्या है,
| भला तुम कहाँ बाज़ आओगे
| आख़िर ज़बाँ सीकने के बहाने
| ख़ियानत करोगे!"
| वो हंसती हुई
| इक नए मश्तरी की तरफ़ मुल्तफ़त हो गई थी!
| 
| तो ख़ालिद ने देखा
| कि रूमान तो ख़ाक में मिल चुका है—
| उसे खेंच-कर जब मैं बाज़ार में ला रहा था,
| लगातार करने लगा वो मक़ूलों में बातें:
|     "ज़बाँ सीकनी हो तो औरत से सीखो!
|     जहाँ-भर में रूसी अदब का नहीं कोई सानी!
|     वो क़फ़क़ाज़ की हूर, मज़दूर औरत!
|     जो दुनिया के मज़दूर सब एक हो जाएँ
|     आग़ाज़ हो इक नया दौरा-ए शादमानी!"
| 
|     मिरे दोस्तों में बहुत इश्तिराकी हैं,
|     जो हर मुहब्बत में मायूस हो-कर,
|     यूँ-ही इक नए दौरा-ए शादमानी की हसरत में
|     करते हैं दिलजूई इक दूसरे की,
|     और अब ऐसी बातों पे मैं
|     ज़ेर-ए लब भी कभी मुस्कराता नहीं हूँ!
| 
| और उस शाम जश्न-ए अरूसी में
| हुस्न‐ओ‐मए‐ओ‐रक़्स‐ओ‐नग़्मा के तूफ़ान बहते रहे थे,
| फ़रंगी शराबें तो अंक़ा थीं
| लेकिन मए-ए नाब-ए क़ज़वीन‐ओ‐ख़ुल्लार-ए शीराज़ के दौर-ए पैहम से,
|     रंगीं लबासों से,
|     ख़ुशबू की बे-बाक लहरों से,
|     बे-साख़्ता क़हक़हों, हम्हमों से,
|     मज़ामीर के ज़ेर‐ओ‐बम से,
|     वो हंगामा बरपा था,
|     महसूस होता था
| तहरान की आख़िरी शब यही है!
| अचानक कहा मर्सिदा ने:
|     "तुम्हारा वो साथी कहाँ है?
|     अभी एक सोफ़े पे देखा था मैं ने
|     उसे सर बज़ानू!"
| 
| तो हम कुछ परेशान से हो गए
| और कम्रा ब कम्रा उसे ढूंडने मिल-के निकले!
| लो इक गोशा-ए नीम-रौशन में
| वो इश्तिराकी ज़मीं पर पड़ा था
| उसे हम हिलाया किये और झंझोड़ा किये
| वो तो साकित था, जामिद था!
| रूसी अदीबों की सर-चश्मा-गाहों की उस को ख़बर हो गई थी?

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.. admonition:: I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry


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        :title: I Too Have Some Dreams Resource Page
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